नज़ाकत से भी नाजुक कहलाती
पर कांटों को भी साथ बसाती
भोरों के मदहोश गुँजन में
नया कोई गीत गुनगुनाती
मन्द हवा के झोंकों में
यूँ ही इठलाती
ओस के नन्हें मोती से
अपना सिंगार करती
कभी दूसरो के दुःख मै
यूँ ही खुद को बैचेन पाती
कांटों से भी घिर कर
उस गुल सी सदा मुस्कुराती
काश मैं गुलाब बन पाती .............
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