मै रूट जाती तो मानते तुम ,
कभी यूँ भी साथ निभाते तुम।
जिन्दगी के गणित में उलछ गए थे जब हम ,
तब मेरा विश्वास जागते तुम।
ना जाने कितना कुछ था कहने को,
काश बिना शब्दों के समझ पाते तुम।
आपने ही अंधेरो में गुम हो गयी हूँ मै ,
कभी तो अहसासों के गर्त में जाते तुम।
हार गयी थी मै लड़ते लड़ते अकेले ज़माने से ,
एक बार तो मेरा हौसला बढ़ाते तुम।
सही गलत की समझ थी मुझको भी ,
पर कभी तो बेपरवाह सा पल विताते तुम।
जानती हु सब परियों की कहानियाँ है झूटी ,
पर कभी तो राक्षस की कैद से छुड़वाते तुम।
आम लोगो सी आम जिंदगानी हमारी ,
पर कभी तो खास महसूस करते तुम।
सपनो की दुनियाँ में ले जाते तुम ,
कभी मुझको भी समझ पाते तुम।
वाह!!
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