Wednesday, September 18, 2019

अभिलाषा




समझ ना पायी उनकी आँखे जब मेरे नयनों की भाषा
इसीलिये शायद अधूरी है मेरे अंतस की अभिलाषा

लाख चाहने पर भी अपनी भवुकता हम छोड़ ना पाये
लेकिन मर्यादा के बन्धन भी हम किँचित तोड़ ना पाये

आशा के परिधान पहनकर हमसे मिलती कही निराशा
इसीलिये शायद अधूरी है मेरे अंतस की अभिलाषा

वे है निकट हमारे फिर भी - लगता कोसो की दूरी हैं
मिलने पर कुछ ना कह सके हम, ये भी कैसी मज़बूरी है

कर्तव्य विभूर विवश मै खड़ी बन एक तमाशा
इसीलिये शायद अधूरी है मेरे अंतस की अभिलाषा

निर्णय के सरसिज मुरझाये गुमसुम सा उर का सरवर है
दीपशिखा सम्मुख है फिर भी अंतर्मन गहन तमस है

जन्मान्तर से समेट रखा है अंतःकरण में गहरा कुसहा
इसीलिये शायद अधूरी है मेरे अंतस की अभिलाषा



काश मैं गुलाब बन पाती





नज़ाकत से भी नाजुक कहलाती 
पर कांटों को भी साथ बसाती 

भोरों के मदहोश गुँजन में 
नया कोई गीत गुनगुनाती 

मन्द हवा के झोंकों में 
यूँ ही इठलाती 

ओस के नन्हें मोती से 
अपना सिंगार करती 

कभी दूसरो के दुःख मै 
यूँ ही खुद को बैचेन पाती 

कांटों से भी घिर कर 
उस गुल सी सदा मुस्कुराती 

काश मैं गुलाब बन पाती .............